(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.316. अध्यायः 316
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति अण्डादिसृष्टिप्रकारादिप्रतिपादकजनकयाज्ञवल्क्यसंवादानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

याज्ञवल्क्य उवाच। 12-316-0x(6507)(78230)
अव्यक्तस्य नरश्रेष्ठ कालसङ्ख्यां निबोध मे।
पञ्चकल्पसहस्राणि द्विगुणान्यहरुच्यते॥ 12-316-1(78231)
रात्रिरेतावती चास्य प्रतिबुद्धो नराधिप।
सृजत्योषधिमेवाग्रे जीवनं सर्वदेहिनाम्॥ 12-316-2(78232)
ततो ब्रह्माणमसृजद्धैरण्याण्डसमुद्भवम्।
सा मूर्तिः सर्वभूतानामित्येवमनुशुश्रुम॥ 12-316-3(78233)
संवत्सरमुषित्वाण्डे निष्क्रम्य च महामुनिः।
संदधेऽर्धं महीं कृत्स्नां दिवमर्धं प्रजापतिः॥ 12-316-4(78234)
द्यावापृथिव्योरिज्येष राजन्वेदेषु पठ्यते।
तयोः शकलयोर्मध्यमाकाशमकरोत्प्रभुः॥ 12-316-5(78235)
एतस्यापि च सङ्ख्यानं वेदवेदाङ्गपारगैः।
दशकल्पसहस्राणि पादोनान्यहरुच्यते॥ 12-316-6(78236)
रात्रिमेतावतीं चास्व प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः।
सृजत्यहंकारमृषिर्भूतं दिव्यात्मकं तथा॥ 12-316-7(78237)
चतुरश्चापरान्पुत्रान्देहात्पूर्वं महानृषिः।
ते वै पितृभ्यः पितरः श्रूयन्तें राजसत्तम॥ 12-316-8(78238)
देवाः पितॄणां च सुता देवैर्लोकाः समावृताः।
चराचरा नरश्रेष्ठ इत्येवमनुशुश्रुम॥ 12-316-9(78239)
परमेष्ठी त्वहंकारोऽसृजद्भूतानि पञ्चधा।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्॥ 12-316-10(78240)
एतस्यापि निशामाहुस्तृतीयमथ कुर्वतः।
पञ्च कल्पसहस्राणि तावदेवाहरुच्यते॥ 12-316-11(78241)
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः।
एते विशेषा राजेन्द्र महाभूतेषु पञ्चसु॥ 12-316-12(78242)
यैराविष्टानि भूतानि अहन्यहनि पार्थिव।
अन्योन्यं स्पृहयन्त्येते अन्योन्यस्याहिते रताः॥ 12-316-13(78243)
अन्योन्यमतिवर्तन्ते अन्योन्यस्पर्धिनस्तथा।
ते वध्यमाना ह्यन्योन्यं गुणैर्हारिभिरव्ययाः॥ 12-316-14(78244)
इहैव परिवर्तन्ते तिर्यग्योनिप्रवेशिनः।
त्रीणि कल्पसहस्राणि एतेषामहरुच्यते॥ 12-316-15(78245)
रात्रिरेतावती चैव मनसश्च नराधिप।
मनश्चरति राजेन्द्र चरितं सर्वमिन्द्रियैः॥ 12-316-16(78246)
न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति।
चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा तु न चक्षुषा॥ 12-316-17(78247)
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति।
अथेन्द्रियाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते॥ 12-316-18(78248)
मनस्युपरते राजन्निन्द्रियोपरमो भवेत्॥ 12-316-19(78249)
न चेन्द्रियव्युपरमे मनस्युपरमो भवेत्।
एवं मनः प्रधानानि इन्द्रियाणि प्रभावयेत्॥ 12-316-20(78250)
इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते।
एतद्विशन्ति भूतानि सर्वाणीह महायशः॥ ॥ 12-316-21(78251)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 316॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-316-4 संदधेऽयं महीमिति ड. थ. पाठः॥ 12-316-8 पुत्रान्देवानिति ड. थ. पाठः। पुत्रान्पूर्वमेव महानृषिरिति। पितॄणां पितर इति झ. पाठः॥ 12-316-13 अन्योन्यस्य हिते रता इति झ. ध. पाठः॥ 12-316-21 एतद्वशे हि भूतानीति ट. ड. थ. पाठः॥


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